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उपभोक्ता आयोग में जमानत खारिज होने पर सत्र न्यायालय का रास्ता खुला: राजस्थान हाईकोर्ट

धारा 72 के मामलों में उपभोक्ता आयोग द्वारा जमानत खारिज होने पर सत्र न्यायालय में राहत ली जा सकती है।

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Justice Anil Kumar Upman

The bench of Justice Anil Kumar Upman

जयपुर: राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 (Consumer Protection Act, 2019) की धारा 72 के तहत चल रहे आपराधिक मामलों में यदि उपभोक्ता आयोग द्वारा जमानत अर्जी खारिज कर दी जाती है, तो आरोपी सत्र न्यायालय में जमानत के लिए आवेदन कर सकता है। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में सत्र न्यायालय और हाईकोर्ट की समवर्ती अधिकारिता समाप्त नहीं होती।

यह टिप्पणी Justice अनिल कुमार उपमन ने संजय सक्सेना बनाम राज्य व अन्य मामले में जमानत याचिका स्वीकार करते हुए की।

मामले की पृष्ठभूमि

मामले में वर्ष 2019 में प्रतिभा श्रीवास्तव और गौरव श्रीवास्तव ने राजस्थान राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग (Rajasthan State Consumer Disputes Redressal Commission), जयपुर में सहारा प्राइम सिटी लिमिटेड सहित अन्य के विरुद्ध शिकायत दर्ज कराई थी। आयोग ने 16 अगस्त 2021 को शिकायत स्वीकार करते हुए गैर-आवेदकों को Rs.66,07,973 की राशि 10 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित लौटाने तथा Rs.2.50 लाख क्षतिपूर्ति देने के निर्देश दिए थे।

आदेश की पालना नहीं होने पर परिवादियों ने अवमानना कार्यवाही शुरू की, जिसमें संजय सक्सेना को भी पक्षकार बनाया गया। आयोग के समक्ष पेश न होने पर उनके खिलाफ वारंट जारी किया गया और गिरफ्तारी के बाद जमानत के लिए आवेदन किया गया।

हालांकि, उपभोक्ता आयोग ने यह कहते हुए जमानत अर्जी खारिज कर दी कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 72 के तहत अपराध गैर-जमानती है।

हाईकोर्ट के समक्ष मुख्य कानूनी प्रश्न

हाईकोर्ट के समक्ष यह प्रश्न उठा कि जब उपभोक्ता आयोग धारा 72 के तहत जमानत खारिज कर देता है, तब आरोपी के पास आगे कौन-सा कानूनी उपाय उपलब्ध रहता है।

Justice अनिल कुमार उपमन ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धाराओं 72 और 73 का विश्लेषण करते हुए कहा कि धारा 72 के तहत अपराध की सुनवाई करते समय जिला, राज्य या राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग को प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट के समान अधिकार प्राप्त होते हैं।

अदालत ने स्पष्ट किया कि अधिनियम में केवल दोषसिद्धि के आदेश के विरुद्ध अपील का प्रावधान है, न कि जमानत खारिज होने जैसे अंतरिम या प्रक्रियात्मक आदेशों के विरुद्ध।

विधि-सिद्धांत (Proposition of Law)

हाईकोर्ट ने यह महत्वपूर्ण विधि-सिद्धांत प्रतिपादित किया कि जमानत याचिका अपील नहीं होती, बल्कि यह आरोपी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा अधिकार है। इसलिए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 73(2) में अपील पर लगाया गया प्रतिबंध जमानत याचिकाओं पर लागू नहीं किया जा सकता।

अदालत ने कहा कि यदि उपभोक्ता आयोग द्वारा जमानत खारिज कर दी जाती है, तो आरोपी BNSS की धारा 483 (पूर्व में CrPC की धारा 439) के तहत संबंधित सत्र न्यायालय में जमानत के लिए आवेदन कर सकता है। सत्र न्यायालय ऐसी जमानत याचिका की पोषणीयता पर सवाल उठाए बिना, उसके गुण-दोष के आधार पर निर्णय करेगा।

मामले में राहत

हाईकोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि आरोपित अपराध की अधिकतम सजा तीन वर्ष है और याचिकाकर्ता पांच माह से अधिक समय से न्यायिक हिरासत में है। इन परिस्थितियों में याचिकाकर्ता को पुनः सत्र न्यायालय भेजना न्याय के हित में उचित नहीं माना गया।

समवर्ती अधिकारिता का प्रयोग करते हुए हाईकोर्ट ने संजय सक्सेना को उपयुक्त शर्तों के अधीन जमानत पर रिहा करने के आदेश दिए।

First published: January 23, 2026